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होटलों में उत्पादन ठप, बिरयानी और मिठाइयों के मेन्यू पर चली कैंची
कोलकाता। महानगर कोलकाता के प्रसिद्ध स्वाद और जायके पर इन दिनों एलपीजी गैस की किल्लत का ग्रहण लग गया है। शहर में वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडरों की भारी कमी के कारण होटल, रेस्टोरेंट, ढाबे और मिठाई की दुकानों का संचालन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। नियमित आपूर्ति ठप होने से पैदा हुए इस संकट ने न केवल बड़े रेस्टोरेंट श्रृंखलाओं को मुश्किल में डाल दिया है, बल्कि उन हजारों छोटे दुकानदारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा कर दिया है जिनका व्यवसाय पूरी तरह प्रतिदिन की गैस सप्लाई पर निर्भर है। शहर के मध्य भाग से लेकर उपनगरीय इलाकों तक, कमर्शियल सिलेंडरों की उपलब्धता न के बराबर रह गई है।
होटल मालिकों का आरोप है कि डिस्ट्रीब्यूटर्स के पास स्टॉक खत्म हो चुका है और बुकिंग के बावजूद हफ्तों तक सिलेंडरों की डिलीवरी नहीं हो रही है। इस विकट स्थिति का सबसे सीधा और घातक असर शहर के मेन्यू कार्ड पर देखने को मिल रहा है। कोलकाता की पहचान बन चुकी हांडी वाली बिरयानी, कबाब और डीप-फ्राई किए जाने वाले व्यंजनों के उत्पादन में भारी कटौती कर दी गई है। चूंकि इन खाद्य पदार्थों को तैयार करने के लिए लंबे समय तक और उच्च आंच वाली गैस की आवश्यकता होती है, इसलिए गैस बचाने के चक्कर में कई रेस्टोरेंट संचालकों ने इन व्यंजनों को अपने दैनिक मेन्यू से अस्थायी रूप से हटा दिया है। यहाँ तक कि शहर की प्रतिष्ठित मिठाई दुकानों में भी दूध उबालने और चाशनी तैयार करने जैसे बुनियादी कामों के लिए पर्याप्त गैस उपलब्ध नहीं हो पा रही है। संकट की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई छोटे व्यवसायी अब दशकों पीछे लौटने को मजबूर हो गए हैं। महानगर की आधुनिक रसोई में अब फिर से कोयले की अंगीठी और लकड़ी के चूल्हों का धुआं उठने लगा है। हालांकि, यह विकल्प भी स्थायी समाधान नहीं है क्योंकि कोयले और लकड़ी के उपयोग से उत्पादन की लागत में भारी वृद्धि हुई है और काम करने की गति बेहद धीमी हो गई है।
कई दुकानदारों का कहना है कि लकड़ी के चूल्हों पर खाना पकाना न केवल श्रमसाध्य है, बल्कि इससे खाने की गुणवत्ता और स्वाद में भी बदलाव आ रहा है, जिससे उनके ग्राहक छिटक रहे हैं। साथ ही, घनी आबादी वाले इलाकों में कोयले का धुआं पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए भी नई चुनौतियां पैदा कर रहा है।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, इस अभूतपूर्व संकट के तार अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता से जुड़े हुए हैं। पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में जारी युद्ध और तनावपूर्ण परिस्थितियों के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह चरमरा गई है। भारत में कच्चे तेल और एलपीजी के आयात में आ रही बाधाओं के चलते केंद्र और राज्य स्तर पर घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी जा रही है। घरेलू आपूर्ति को सुचारू रखने के लिए कमर्शियल कोटे में कटौती की गई है, जिसका सीधा खामियाजा होटल उद्योग को भुगतना पड़ रहा है। इस दौरान विशेषज्ञों ने एक बार फिर कोलकाता के बुनियादी ढांचे पर सवाल उठाए हैं।
उनका मानना है कि यदि महानगर में पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) का जाल पहले ही बिछा दिया गया होता, तो आज होटल कारोबारियों को सिलेंडरों के लिए दर-दर नहीं भटकना पड़ता। पीएनजी के अभाव में कोलकाता का खाद्य व्यवसाय पूरी तरह आयातित एलपीजी पर निर्भर है, जो वर्तमान में वैश्विक समीकरणों का शिकार हो गया है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन ने गहरी चिंता व्यक्त की है।
संगठन का मानना है कि यदि आगामी एक सप्ताह के भीतर आपूर्ति सामान्य नहीं हुई, तो शहर के 40 प्रतिशत से अधिक छोटे और मध्यम दर्जे के रेस्टोरेंट पूरी तरह बंद होने की कगार पर पहुँच जाएंगे। फिलहाल, महानगर के व्यवसायी और आम जनता दोनों ही इस उम्मीद में हैं कि कूटनीतिक स्तर पर इस संकट का समाधान निकलेगा और कोलकाता की गलियों में फिर से पकवानों की वही पुरानी महक लौटेगी।